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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 33.30

प॒थस्प॑थः॒ परि॑पतिं वच॒स्या कामे॑न कृ॒तो अ॒भ्या॑नळ॒र्कम् ।
स नो॑ रासच्छु॒रुध॑श्च॒न्द्राग्रा॒ धियं॑धियᳪ सीषधाति॒ प्र पू॒षा ॥५॥

पूरा अध्याय