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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 33.29

पूष॒न्तव॑ व्र॒ते व॒यं न रि॑ष्येम॒ कदा॑ च॒न । स्तो॒तार॑स्त इ॒हस्म॑सि ॥४॥

पूरा अध्याय