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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 33.27

उष॒स्तच्चि॒त्रमा भ॑रा॒स्मभ्यं॑ वाजिनीवति । येन॑ तो॒कं च॒ तन॑यं च॒ धाम॑हे ॥२॥

पूरा अध्याय