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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 33.26

(१) २५
आ रा॑त्रि॒ पर्थि॑व॒ᳪ रजः॑ पि॒तुर॑प्रायि॒ धाम॑भिः ।
दि॒वः सदा॑ᳪसि बृह॒ती वि ति॑ष्ठस॒ आ त्वे॒षं व॑र्तते॒ तमः॑ ॥१॥

पूरा अध्याय