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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 3.58

दे॒हि मे॒ ददा॑मि ते॒ नि मे॑ धेहि॒ नि ते॑ दधौ । नि॒हारं॑ निह॑रामि ते नि॒हारं॒ निह॑रासि मे॒ स्वाहा॑ ॥२॥

पूरा अध्याय