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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 3.33

अग्ने॒ त्वं नो॒ अन्त॑म उ॒त त्रा॒ता शि॒वो भ॑वा वरू॒थ्यः॑ । वसु॑र॒ग्निर्वसु॑श्रवा॒ अच्छा॑ नक्षि द्यु॒मत्त॑मᳪ र॒यिं दाः॑ ॥१७॥

पूरा अध्याय