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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 24.47

(२०) ४६
एक॑स्मै॒ स्वाहा॒ द्वाभ्या॒ᳪ स्वाहा॑ श॒ताय॒ स्वाहै॑कशताय॒ स्वाहा॑ ।
व्यु॑ष्ट्यै॒ स्वाहा॑ स्व॒र्गाय॒ स्वाहा॑ ॥१॥

पूरा अध्याय