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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 24.46

(१९) ४५
आयु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ प्रा॒णो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑पा॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑
व्या॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ ।
उ॒दा॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ समा॒नो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒ चक्षु॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒
श्रोत्रं॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ ।
वाग्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒ मनो॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒त्मा य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑
पृ॒ष्ठं य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ ।
ब्रह्म॑ य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ य॒ज्ञो य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒ ज्योति॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॒
स्व॑र्य॒ज्ञेन॑ कल्पता॒ᳪ स्वाहा॑ ॥१॥

पूरा अध्याय