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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 22.66

गोम॑दू॒ षु णा॑स॒त्याश्वा॑वद्यातमश्विना । व॒र्ती रु॑द्रा नृ॒पाय्य॑म् ॥२॥

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