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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.66

यो अ॒ग्निः क॑व्य॒वाह॑नः पि॒तॄन्यक्ष॑दृता॒वृधः॑ । प्रेदु॑ ह॒व्यानि॑ वोचति दे॒वेभ्य॑श्च पि॒तृभ्य॒ आ ॥१५॥

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