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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.65

यम॑ग्ने कव्यवाहन॒ त्वं चि॒न्मन्य॑से र॒यिम् । तन्नो॑ गी॒र्भिः श्र॒वाय्यं॑ देव॒त्रा प॑नया॒ युज॑म् ॥१४॥

पूरा अध्याय