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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 21.5

पु॒नाति॑ ते परि॒स्रुत॒ᳪ सोम॒ᳪ सूर्य॑स्य दुहि॒ता । वारे॑ण॒ शश्व॑ता॒ तना॑ ॥४॥

पूरा अध्याय