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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 2.33

च॒क्षु॒ष्पा अ॑सि॒ चक्षु॑र्मे पाहि ।यं प॑रि॒धिं प॒र्यध॑त्था॒ अग्ने॑ देव प॒णिभि॑र्गु॒ह्यमा॑नः ॥४॥

पूरा अध्याय