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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.50

इन्द्रे॒मं प्र॑त॒रां न॑य सजा॒ताना॑मसद्व॒शी । समे॑नं॒ वर्च॑सा सृज दे॒वानां॑ भाग॒दा अ॑सत् ॥२॥

पूरा अध्याय