Utshovऐप डाउनलोड करें

शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.49

(४) ४९
उदे॑नमुत्त॒रां न॒याग्ने॑ घृतेनाहुत । रा॒यस्पोषे॑ण॒ सᳪसृ॑ज प्र॒जया॑ च ब॒हुं कृ॑धि ॥१॥

पूरा अध्याय