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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 18.45

प्रेता॒ जय॑ता नर॒ इन्द्रो॑ वः॒ शर्म॑ यच्छतु । उ॒ग्रा वः॑ सन्तु बा॒हवो॑ऽनाधृ॒ष्या यथास॑थ ॥१४॥

पूरा अध्याय