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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 13.92

अ॒व॒य॒तीः सम॑वदन्त दि॒व ओष॑धय॒स्परि॑ । यं जी॒वम॒श्नवा॑महै॒ न स रि॑ष्याति॒ पूरु॑षः ॥१७॥

पूरा अध्याय