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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 12.41

उदु॑ तिष्ठ स्वध्व॒रावा॑ नो दे॒व्या धि॒या ।
दृ॒शे च॑ भा॒सा बृ॑ह॒ता शु॑शु॒क्वनि॒राग्ने॑ याहि सुश॒स्तिभिः॑ ॥४॥

पूरा अध्याय