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शुक्ल यजुर्वेद (काण्व) 12.40

सुजा॑तो॒ ज्योति॑षा स॒ह शर्म॒ वरू॑थ॒मास॑द॒त्स्वः॑ । वासो॑ अग्ने वि॒श्वरू॑प॒ᳪ संव्य॑यस्व विभावसो ॥३॥

पूरा अध्याय