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वाल्मीकि रामायण 82.6

अभिवाद्याब्रवीद्रामो महर्षिं कुम्भसम्भवम् ।
आपृच्छे स्वां पुरीं गन्तुं मामनुज्ञातुमर्हसि ।। ७.८२.६ ॥

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