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वाल्मीकि रामायण 55.15

स राज्ञो दर्शनाकाङ्क्षी मुहूर्तं समुपाविशत् ।
तस्मिन्नहनि राजर्षिर्निद्रया ऽपहृतो भृशम् ।। ७.५५.१५ ॥

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