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वाल्मीकि रामायण 52.17

एवमुक्तः स काकुत्स्थो लक्ष्मणेन महात्मना ।
उवाच परया प्रीत्या सौमित्रिं मित्रवत्सलः ।। ७.५२.१७ ॥

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