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वाल्मीकि रामायण 5.40

प्रहस्तो ऽकम्पनश्चैव विकटः कालकार्मुखः ।
धूम्राक्षश्चैव दण्डश्च सुपार्श्वश्च महाबलः ।। ७.५.४० ॥

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