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वाल्मीकि रामायण 34.6

चतुर्भ्यो ऽपि समुद्रेभ्यः सन्ध्यामन्वास्य रावण ।
इमं मुहूर्तमायाति वाली तिष्ठ मुहूर्तकम् ।। ७.३४.६ ॥

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