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वाल्मीकि रामायण 109.5

अव्याहरन्क्वचित्किञ्चिन्निश्चेष्टो निःसुखः पथि ।
निर्जगाम गृहात्तस्माद्दीप्यमान इवांशुमान् ।। ७.१०९.५ ॥

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