ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 108108.7वाल्मीकि रामायण 108.7तच्छ्रुत्वा घोरसङ्काशं कुलक्षयमुपस्थितम् । प्रकृतीस्तु समानीय काञ्चनं च पुरोधसम् ।। ७.१०८.७ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय