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वाल्मीकि रामायण 103.8

सो ऽभिगम्य रघुश्रेष्ठं दीप्यपानं स्वतेजसा ।
ऋषिर्मधुरया वाचा वर्धस्वेत्याह राघवम् ।। ७.१०३.८ ॥

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