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वाल्मीकि रामायण 10.37

न तावत्कुम्भकर्णाय प्रदातव्यो वरस्त्वया ।
जानीषे हि यथा लोकांस्त्रासयत्येष दुर्मतिः ।। ७.१०.३७ ॥

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