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वाल्मीकि रामायण 86.4

स त्वमिन्द्राशनिप्रख्यैः शरैरवकिरन् परान्।
अभिद्रवाशु यावद्वै नैतत् कर्म समाप्यते ।। ६.८६.४ ।।

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