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वाल्मीकि रामायण 85.33

स गत्वा दूरमध्वानं सौमित्रिर्मित्रनन्दनः।
राक्षसेन्द्रबलं दूरादपश्यद् व्यूहमास्थितम् ।। ६.८५.३३ ।।

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