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वाल्मीकि रामायण 80.5

तथोक्तो राक्षसेन्द्रेण प्रतिगृह्य पितुर्वचः।
यज्ञभूमौ स विधिवत् पावकं जुहवेन्द्रजित् ।। ६.८०.५ ।।

पूरा अध्याय