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वाल्मीकि रामायण 80.4

त्वमप्रतिमकर्माणमिन्द्रं जयसि संयुगे।
किं पुनर्मानुषौ दृष्ट्वा न वधिष्यसि संयुगे ।। ६.८०.४ ।।

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