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वाल्मीकि रामायण 79.32

विभ्राम्य तु महच्छूलं प्रज्वलत्तन्निशाचरः।
स क्रोधात् प्राहिणोत्तस्मै राघवाय महाहवे ।। ६.७९.३२ ।।

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