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वाल्मीकि रामायण 78.5

सो ऽबिवाद्य दशग्रीवं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम्।
निर्जगाम गृहाच्छुभ्राद्रावणस्याज्ञया बली ।। ६.७८.५ ।।

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