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वाल्मीकि रामायण 74.67

किमेतदेवं सुविनिश्चितं ते यद्राघवे नासि कृतानुकम्पः।
पश्याद्य मद्बाहुबलाभिभूतो विकीर्णमात्मानमथो नगेन्द्र ।। ६.७४.६६ ।।

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