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वाल्मीकि रामायण 74.66

स ता महात्मा हनुमानपश्यन् चुकोप कोपाच्च भृशं ननाद।
अमृष्यमाणो ऽग्निनिकाशचक्षुर्महीधरेन्द्रं तमुवाच वाक्यम् ।। ६.७४.६५ ।।

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