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वाल्मीकि रामायण 71.15

धनूंषि चास्य सज्यानि हेमपृष्ठानि सर्वशः।
शोभयन्ति रथश्रेष्ठं शक्रचाप इवाम्बरम् ।। ६.७१.१५ ।।

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