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वाल्मीकि रामायण 64.2

कुम्भकर्ण कुले जातो धृष्टः प्राकृतदर्शनः।
अवलिप्तो न शक्नोषि कृत्यं सर्वत्र वेदितुम् ।। ६.६४.२ ।।

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