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वाल्मीकि रामायण 59.141

तं निर्विषाशीविषसन्निकाशं शान्तार्चिषं सूर्यमिवाप्रकाशम् ।
गतश्रियं कृत्तकिरीटकूटमुवाच रामो युधि राक्षसेन्द्रम् ।। ६.५९.१४२ ।।।।

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