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वाल्मीकि रामायण 59.138

अथेन्द्रशत्रुं तरसा जघान बाणेन वज्राशनिसन्निभेन ।
भुजान्तरे व्यूढसुजातरूपे वज्रेण मेरुं भगवानिवेन्द्रः ।। ६.५९.१३९ ।।।।

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