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वाल्मीकि रामायण 59.105

निकृत्तचापं त्रिभिराजघान बाणैस्तदा दाशरथिः शिताग्रः ।
स सायकार्तो विचचाल राजा कृच्छ्राच्च सञ्ज्ञां पुनराससाद ।। ६.५९.१०६ ।।।।

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