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वाल्मीकि रामायण 57.27

उरगध्वजदुर्द्धर्षं सुवरूथं स्वपस्करम् ।
सुवर्णजालसंयुक्तं प्रहसन्तमिव श्रिया ।। ६.५७.२७ ।।।।

पूरा अध्याय