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वाल्मीकि रामायण 56.29

ततो ऽन्यं वृक्षमुत्पाट्य कत्वा वेगमनुत्तमम् ।
शिरस्यभिजघानाशु राक्षसेन्द्रमकम्पनम् ।। ६.५६.२९ ।।।।

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