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वाल्मीकि रामायण 54.2

स विस्फार्य धनुर्घोरं शक्राशनिसमस्वनम् ।
वानराणामनीकानि प्राकिरच्छरवृष्टिभिः ।। ६.५४.२ ।।।।

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