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वाल्मीकि रामायण 53.25

वज्रदंष्ट्रो भृशं बाणै रणे वित्रासयन् हरीन् ।
चचार लोकसंहारे पाशहस्त इवान्तकः ।। ६.५३.२५ ।।।।

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