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वाल्मीकि रामायण 53.19

निष्पतन्तो महोत्साहा भिन्नदेहशिरोधराः ।
रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा न्यपतन् जगतीतले ।। ६.५३.१९ ।।।।

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