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वाल्मीकि रामायण 53.14

आकाशाद्विघनात्तीव्रा उल्काश्चाभ्यपतंस्तदा ।
वमन्त्यः पावकज्वालाः शिवा घोरं ववाशिरे ।। ६.५३.१४ ।।।।

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