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वाल्मीकि रामायण 50.34

अभवन् पन्नगास्त्रस्ता भोगिनस्तत्रवासिनः ।
शीघ्रं सर्वाणि यादांसि जग्मुश्च लवणार्णवम् ।। ६.५०.३५ ।।।।

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