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वाल्मीकि रामायण 44.4

जहि दारय चैहीति कथं विद्रवसीति च ।
एवं सुतुमुलः शब्दस्तस्मिंस्तमसि शुश्रुवे ।। ६.४४.४ ।।।।

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