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वाल्मीकि रामायण 43.27

तेषां चतुर्णां रामस्तु शिरांसि निशितैः शरै ।
क्रुद्धश्चतुर्भिश्चिच्छेद घोरैरग्निशिखोपमैः ।। ६.४३.२७ ।।।।

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